जलवायु संकट पर भारत का अनुकूलन

 

जलवायु संकट पर भारत को अनुकूलन पर ध्यान क्यों देना चाहिए ?

यूएन 2014, के अनुसार सन 2050 तक दुनिया की आबादी के 66 फीसदी लोग शहरों में रहेंगे, इसका मतलब है कि हमें इन आवासों के निर्माण में यदि ग्रीन इन्फ्रास्ट्रक्चर को लागू नहीं किया गया तो दुनिया भर में वायु प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन बढ़ेगा।

भारत में भी कई राज्यों में संचालित सामाजिक क्षेत्र के कार्यक्रमों में फिर से नए स्तर से सोचने की आवश्यकता है। क्या प्रधानमंत्री आवास योजना से जलवायु और आपदा प्रतिरोधी आवासों के निर्माण में मदद नहीं मिलनी चाहिए? क्या हर घर जल योजना का उद्देश्य स्थायी जल स्रोतों का दोहन नहीं करना चाहिए? 

ब्लॉक और पंचायत स्तरों पर स्थानीय विकास योजनाओं को सार्वजनिक और निजी दोनों, जलवायु-लचीला प्रणालियों, आजीविका और संपत्ति के विकास पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता आज के प्रगतिशील भारत की आवश्यकता है।

बुनियादी ढांचे निर्माण को पूरा करने के लिए में मानकों को फिर से डिजाइन किया जाना चाहिए। पूर्व चेतावनी प्रणाली और जलवायु और आपदा प्रतिरोधी बुनियादी ढांचे में निवेश से आपदा की स्थिति में जानमाल, आजीविका और संपत्ति के नुकसान को कम किया जा सकेगा। सौभाग्य से, भारत में इस तरह के अधिकांश बुनियादी ढांचे का निर्माण अभी बाकी है।

 

चंडीगढ़ से सीखे भारत:

चंडीगढ़ देश का पहला ऐसा शहर है, जिसका 40 प्रतिशत हिस्सा ग्रीन कवर है। फॉरेस्ट कवर एरिया घटने के बजाय बढ़ा है। यही वजह है कि चंडीगढ़ को पर्यावरण और सार्वजनिक इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में बेहतर कार्य करने पर पहला स्थान मिला है। 2019 में केंद्रीय कार्मिक राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह ने देश में राज्यों के शासन का आकलन करने वाला सुशासन सूचकांक (जीजीआइ) जारी किया। इसमें यूटी की कैटेगरी में इन दो क्षेत्रों में चंडीगढ़ को पहले स्थान पर रखा गया है। इसमें राज्यों को तीन समूहों में बांटा गया। बड़े राज्य, पूर्वोत्तर एवं पर्वतीय राज्य और केंद्र शासित प्रदेश।

 

यूपी सही दिशा में :

उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रदूषण को रोकने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर को बड़े पैमाने पर विकसित करने का फैसला लिया है। यूपी के 7 बड़े शहरों में प्रदूषण खत्म करने के लिए बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किए जाने की योजना है। वायु और ध्वनि प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए सरकार ने कार्ययोजना तैयार कर ली है। इस योजना में लखनऊ, आगरा, प्रयागराज, गाजियाबाद, कानपुर, वाराणसी व मेरठ शहर शामिल किए गए हैं। इनमें वायु प्रदूषण पर 24 घंटे नजर रखने के लिए ऑटोमैटिक मॉनिटरिंग स्टेशन बनाए जाएंगे। इनमें हर समय रियल-टाइम डाटा रहेगा। मैनुअल स्टेशन की भी संख्या बढ़ाई जाएगी।

 

केंद्र सरकार का प्रोत्साहन:

केंद्र सरकार ने 15वें वित्त आयोग से मिलियन प्लस शहरों के नगरीय निकायों के लिए पहली किस्त जारी की थी । इसके तहत प्रदेश के सात शहरों के लिए 357 करोड़ रुपए मिले हैं। इस धनराशि से शहरों के प्रदूषण नियंत्रण के लिए मूलभूत इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किया जा सकता है। इसी के तहत उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने सात शहरों में प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए विस्तृत कार्ययोजना तैयार की है।

 

हरों से वायु प्रदूषण खत्म करने के लिए ये कदम हो सकते हैं कारगर:

इंग्लैंड की सर्वेयर यूनिवर्सिटी के ग्लोबल सेंटर फॉर क्लीन एयर रिसर्च (जीसीआरईआर) ने वायु प्रदूषण, ग्रीन इन्फ्रास्ट्रक्चर और मानव स्वास्थ्य आपस में किस तरह जुड़े हैं, इस पर तीन अलग-अलग क्षेत्रों में अध्ययन किए हैं। 

अध्ययन में कहा गया है कि घर बनाने वाले डेवलपर्स, शहरों की योजनाएं बनाने वाले प्लानर्स और राजनेताओं को इस बात की जानकारी होने चाहिए कि शहरों को इस तरह से बसाया जाए, जिससे पर्यावरण को नुकसान न हो।

सर्वेयर विश्वविद्यालय में जीसीएआरई के निदेशक और प्रमुख अध्ययनकर्ता, प्रोफेसर प्रशांत कुमार ने कहा कि ब्रिटेन में हर साल 3 लाख घर बनाने की जरूरत है। दुनिया भर के लगभग सभी बड़े शहरों में हर साल नए घर बनाने का दबाव रहता है। ऐसे में, घरों को बनाने से पहले हमें उन डेवलपर्स और योजनाकारों को सूचीबद्ध करना होगा, जो घर बानाने के साथ-साथ वायु प्रदूषण, उसके प्रभावों को किस तरह कम किया जाए इस बारे में जानकारी रखते हो, उन्हें ग्रीन इन्फ्रास्ट्रक्चर को लागू करने का सबसे अच्छा तरीका क्या है इस बारे में जानकारी होनी चाहिए। निर्माण सम्बंधित दिशानिर्देश भी स्पष्ट होने चाहिए जिसका वो आसानी से पालन कर सकें।

 

वायु प्रदूषण, ग्रीन इन्फ्रास्ट्रक्चर और मानव स्वास्थ्य आपस में कैसे जुड़े हैं, इसकी बेहतर समझ बनाने के लिए लगातार अध्ययन जारी हैं। वायु प्रदूषण और जलवायु संकट को दूर करने के लिए यह एक बहुत बड़ा प्रयास है, साथ ही भविष्य में हम इन संकटों से छुटकारा पाने का लक्ष्य भी प्राप्त कर लेगें

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